गरीब किसान कि कहानी
धूप झुलसाती थी, खेतों में दरारें पड़ी थीं, मानो धरती की प्यास बुझाने का कोई ज़रिया ही न बचा हो. रामलाल, हड्डियों का पिंजर ढके हुए सफेद धोती में, सूखे खेत को निहार रहा था. उसकी आंखें नमी भरी थीं, पर आसमान में बादल का नामोनिशान नहीं. रामलाल एक गरीब किसानथा. सालों से खेती कर रहा था, पर इस साल बारिश ने धोखा दिया था. फसल सूखकर तिनके बन गए थे, बैलों के लिए चारा जुटाना भी मुश्किल हो गया था. उसकी पत्नी, सीता, घर के अंदर बैठी रो रही थी. उनके तीन बच्चे भूख से तड़प रहे थे. हताशा के बीच रामलाल को एक विचार आया. गाँव के सरपंच ने पिछले साल गाँव के तालाब को गहरा करवाया था. पानी तो नहीं आया, पर ज़मीन नम ज़रूर थी. रामलाल ने सोचा कि वहाँ सब्ज़ी उगाकर देखूँ. कम से कम बच्चों का पेट तो भर सकेगा. उसने सीता को बताया तो पहले तो वो हिचकिचाई, पर मजबूरी के आगे हार माननी पड़ी. रामलाल ने तालाब की नम ज़मीन पर टमाटर, मिर्च और लौकी के बीज बो दिए. दिन-रात मेहनत करता. सुबह तालाब से कड़ाह भरकर पानी लाता, फिर सब्ज़ियों को सींचता. दिन भर खेत में ही रहता, धूप-पानी की परवाह किए बिना. धीरे-धीरे बीजों में जान आई. हरी-हरी क्...