दो दुनियां, एक कहानी (Do Duniyan, Ek Kahani - Two Worlds, One Story)

दो दुनियां, एक कहानी (Do Duniyan, Ek Kahani - Two Worlds, One Story)
सूर्य की पहली किरणें गंगा के पवित्र जल पर चमकती थीं. एक ओर विशाल हवेली खड़ी थी, जिसकी ऊंची दीवारें ऐश्वर्य की कहानी बयां करती थीं. ये हवेली सेठ धर्मदास (Seth Dharmadass) की थी, जो शहर के सबसे धनी व्यापारी थे. दूसरी ओर, नदी के किनारे झुग्गियों का एक झुंड था. टीन की जर्जर छतें और मिट्टी की दीवारें गरीबी का दंश बयां करती थीं. इन झोपड़ियों में से एक में रहता था रामू, एक गरीब रिक्शाचालक.

धर्मदास की जिंदगी सुख-सुविधाओं से भरी थी. हर सुबह रेशमी चादरों पर उठते, स्वादिष्ट भोजन करते और आलीशान गाड़ी में दफ्तर जाते. उनकी बेटी, अंजलि (Anjali), विदेश में पढ़ाई कर रही थी. रामू का जीवन इससे बिल्कुल उल्टा था. हर सुबह भूख से व्याकुल उठता, सड़क पर यात्रियों को ढूंढता और रात को थका हुआ लौटता. उसकी पत्नी, सीता (Seeta), और दो छोटे बच्चे एक वक्त के भोजन के लिए भी तरसते थे.

एक दिन, धर्मदास की गाड़ी एक संकरे रास्ते से गुजर रही थी. अचानक, एक रिक्शा गाड़ी से टकरा गई. गाड़ी चलाने वाला रामू था. दोनों गाड़ियों को मामूली नुकसान हुआ. धर्मदास गुस्से से निकले और रामू को गाली देने लगे. रामू ने माफी मांगी, पर धर्मदास ने उसे गरीबी का ताना मारते हुए, हर्जाने के लिए पैसे मांगे. रामू के पास इतने पैसे नहीं थे.

उस समय, एक बुजुर्ग साधु (Sadhu - holy man) वहां से गुजर रहे थे. उन्होंने पूरा ماجरा (maajra - incident) देखा और सुना. साधु धर्मदास के पास गए और कहा, "धनवान सेठ, कभी-कभी गरीबी असली गरीबी नहीं होती, बल्कि असली गरीबी तो धन के मद में अंधे हो जाना होता है." धर्मदास ने साधु की बात को अनसुना कर दिया और ड्राइवर को गाड़ी चलाने का आदेश दिया.

वह रात रामू के लिए बहुत मुश्किल थी. सीता रो रही थीं और बच्चों को भूख से तड़प देख उसका दिल टूट रहा था. अगले दिन, रामू रिक्शा चलाने निकला, पर उसका मन उदास था. अचानक, उसने देखा कि एक अमीर आदमी (aadmi - man) उसे रुकने का इशारा कर रहा है. वह आदमी कोई और नहीं बल्कि वही साधु था.

साधु ने रामू को अपने आश्रम (ashram) चलने को कहा. रामू हिचकिचाया, पर साधु के आग्रह पर वह उनके साथ चला गया. आश्रम शांत और सुंदर था. वहां साधु रामू को अपने साथ रहने का प्रस्ताव दिया. रामू को संदेह हुआ, पर साधु ने उसे आश्वासन दिया कि वह उसे एक खास हुनर सिखाएंगे. रामू राजी हो गया और आश्रम में रहने लगा.

कुछ दिनों बाद, साधु ने रामू को बताया कि उनके पास एक जादुई पत्थर (jadui patthar - magic stone) है, जो किसी भी बीमारी को ठीक कर सकता है. उन्होंने रामू को वह पत्थर दिया और कहा कि वह शहर जाकर बीमार लोगों का इलाज करे. रामू को पहले तो विश्वास नहीं हुआ, पर साधु ने उसे पत्थर की शक्ति का प्रदर्शन किया.

रामू शहर लौटा और नदी के किनारे बैठ गया. धीरे-धीरे लोगों को उसके बारे में पता चला और वे बीमारों को उसके पास लाने लगे. रामू पत्थर को दिखाता और लोगों को विश्वास दिलाता.
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